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रिश्‍ते को निभाना कोई मुलायम से सीखे,राजनीति में जिन्‍हें धोबीपछाड़ दिया उनके भी सुख-दु:ख में सहभागी रहे नेताजी

मुश्ताक अहमद/ इमरान अहमद

लखनऊ। सपा संस्‍थापक और सूबे के तीन बार सीएम रहे मुलायम सिंह यादव का सोमवार की सुबह 8:16 बजे गुरुग्राम के मेदांता अस्‍पताल में निधन हो गया। उनके निधन से देश भर में शोक की लहर है। हर कोई नेताजी के जाने से दुखी है और अपने-अपने ढंग से उन्‍हें याद कर रहा है।

अखाड़े और राजनीति की पिच पर विरोधियों को धोबीपछाड़ देकर अक्‍सर चित करने वाले मुलायम सिंह यादव को रिश्‍ते बनाने और निभाने वाले नेता के तौर पर जाना जाता है। अपनी पार्टी हो या विरोधी दल नेताजी से रिश्‍तों का दम भरने वाले हर कहीं और हर जगह मिल जाते हैं। वजह यह कि इस धरतीपुत्र ने छात्र जीवन से लेकर राजनीति के लम्‍बे सफर तक में कभी किसी से जानबूझकर व्‍यक्तिगत दुश्‍मनी नहीं की। फिर यह मुलायम सिंह जैसे बड़े कद के नेता के लिए ही मुमकिन है कि आम चुनाव की रणभेरी बजने के ठीक पहले लोकसभा के अंतिम सत्र के अंतिम दिन संसद में खड़े होकर अपनी राजनीतिक विरासत और विचारधारा के बिल्‍कुल उलट मानी जाने वाली पार्टी के नेता और देश के प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी की जीत की कामना कर समूचे विपक्ष को अचम्‍भे में डाल दिया।
उस दिन दुनिया ने देखा कि मुलायम ने न सिर्फ मोदी को फिर से पीएम के रूप में देखने की इच्‍छा व्‍यक्‍त की विपक्षी बेंचों की ओर देखते हुए यह भी कबूल किया कि हम लोग इतने बहुमत में नहीं आ सकते।

मुलायम ने संसद में यह बयान तब दिया था जब यूपी में बीजेपी का विजय रथ रोकने के लिए अखिलेश सपा की चिरविरोधी मायावती के साथ गठबंधन कर मैदान में उतरे थे।किसी ने कल्‍पना भी नहीं की थी कि नेताजी ऐसा कुछ कर सकते हैं लेकिन नेताजी की शख्‍सियत को जानने वाले जानते हैं कि पूरी जिंदगी उन्‍होंने राजनीति में कभी कोई संकीर्णता नहीं दिखाई। बड़ा दिल और बड़ी सोच के साथ मुलायम सिंह यादव ने सैफई से उठकर सत्‍ता के शिखर तक का सफर तय किया।वह तीन बार देश के सबसे बड़े राज्‍य यूपी के मुख्‍यमंत्री बने। देश के रक्षामंत्री रहे लेकिन राजनीति के शीर्ष पर होने के बावजूद घमंड उन्‍हें छू तक नहीं पाया। बताते हैं कि मुलायम अपनी पार्टी ही नहीं विरोधी दल के नेताओं के लिए भी हमेशा उपलब्‍ध रहा करते थे।

उम्र के 83 वें पड़ाव पर पहुंचने के बाद भी मुलायम की राजनीतिक दूरदर्शिता कम नहीं हुई थी

पहलवानी से शिक्षक और शिक्षक से राजनीति के मैदान में दांव-पेंच आजमाते-आजमाते मुलायम कई बार विवादों केे केंद्र में भी रहे लेकिन फैसले लेने और आगे बढ़ने में कभी हिचकिचाए नहीं। फिर वो चाहे 1990 में रामजन्‍मभूमि आंदोलन के दौरान कारसेवकों पर गोली चलवाने का फैसला हो या फिर 1994 में मुख्यमंत्री रहते हल्‍ला बोल के आह्वान का। मुलायम सिंह के विवादित बयानों और विचारों से भारतीय राजनीति में हलचल मचती रही। मसलन, 2015 में एक सभा के दौरान बलात्‍कार पर उनका विवादित बयान (लड़के हैं,गलतियां…) आया जो विरोधियों के लिए सपा पर हमले का बड़ा हथियार बन गया। इसी तरह एक चुनाव अभियान के दौरान मुलायम सिंह ने अंग्रेजी और कम्प्यूटर की शिक्षा के बारे में जो कुछ कहा उसे भी विरोधियों ने मुद्दा बनाने की भरपूर कोशिश की। मुलायम पर नि‍लंबित आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर को धमकाने का आरोप भी लगा। ऐसे कई किस्‍से बीच-बीच में सुनाई पड़ते रहे लेकिन मुलायम सिंह की धाकड़ राजनीतिक छवि पर कोई असर नहीं पड़ा।

मुलायम के न्‍यौते पर सैफई पहुंचे थे पीएम मोदी

फिर वो तस्‍वीरें भला कोई कैसे भूल सकता है जब पीएम मोदी मुलायम सिंह यादव के न्‍यौते पर सैफई पहुंचे थे। वह मुलायम सिंह के पौत्र तेजप्रताप सिंह यादव के तिलकोत्सव में पहुंचे। मुलायम और राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव के बीच रिश्तेदारी के गवाह बने। पीएम मोदी ने मंच पर मुलायम और उनके समधी बने लालू से हाथ मिलाया। दोनों को साथ लेकर उपस्थित लोगों का अभिवादन किया और करीब 22 मिनट तक दोनों यादव परिवार के सदस्यों से बड़ी आत्मीयता से मिले। मुलायम के पौत्र मैनपुरी सांसद तेज प्रताप सिंह को आर्शीवाद दिया तो सीएम अखिलेश यादव की बेटी को गोद में लेकर दुलारा भी।

चंद्रशेखर को पीएम बनाने में भी रही मुलायम की भूमिका

राजनीति के जानकार बताते हैं कि लोकसभा में वीपी सिंह के बहुमत खोने के बाद चंद्रशेखर को प्रधानमंत्री बनवाने में भी मुलायम सिंह की भूमिका रही। मुलायम ने चंद्रशेखर की पार्टी से अलग होकर अपनी समाजवादी पार्टी खड़ी कर ली लेकिन बलिया के बाबूसाहब से रिश्‍ता उनके निधन के बाद भी कायम रहा। मुलायम ने चंद्रशेखर के बेटे नीरज शेखर को लोकसभा के लिए न सिर्फ अपनी पार्टी का टिकट दिया बल्कि परिवार के साथ हर सुख-दु:ख में खड़े नज़र आए। मुलायम की यह खासियत कभी नहीं भुलाई जा सकेगी। वह जिनसे रिश्‍ता निभाते थे, खुलकर उसके साथ भी खड़े नज़र आते थे। फिर वो चाहे उनकी राजनीतिक विचारधारा या पार्टी लाइन में फिट बैठता हो या नहीं।

संघर्ष की मिसाल मुलायम सिंह
मुलायम सिंह ने राजनीतिक के अखाड़े में कई बाद ऐसा धोबिया पाट चला कि सब चित्त हो गए। लेकिन सत्‍ता के शिखर तक वह यूं ही नहीं पहुंचे थे। पुराने लोगों को अब भी याद है कि 80 के दशक में मुलायम  किस तरह लखनऊ में साइकिल से सवारी करते भी दिख जाया करते थे। वह कई बार साइकिल चलाते हुए अखबारों के दफ्तरों में पहुंच जाया करते थे। उनकी इन्‍हीं आदतों ने उन्‍हें एक सादगी पसंद और जमीन से जुड़े ऐसे नेता के तौर पर उभारा जो आगे चलकर धरतीपुत्र के नाम से मशहूर हो गया।

कभी खुद परिवारवाद के विरोधी थे मुलायम
मुलायम सिंह यादव पर परिवारवाद के आरोप लगते रहे लेकिन यह जानकर लोगों को हैरानी होगी कि 80 के दशक तक मुलायम खुद परिवारवाद के बहुत बड़े विरोधी थे। यही नहीं वह चौधरी चरण सिंह के साथ मिलकर इंदिरा गांधी पर वंशवाद का आरोप लगाने का कोई मौका भी नहीं छोड़ते थे। हालांकि बाद में जब मुलायम के भाई, भतीजे और बेटा सब पॉलिटिक्‍स में आ गए तो वह खुद वंशवादी होने के आरोपों से घिरे नजर आने लगे।

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