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सातवीं मुहर्रम:आज ही के दिन पानी रोका गया था इमाम हुसैन के कुनबे का 

मुश्ताक अहमद

गोंडा। चौदह सौ अड़तीस वर्ष पूर्व मुहर्रम की सात तारीख को कर्बला के मैदान में इमाम-ए-हुसैन व उनके कुनबे के लोगों का जालिमों ने पानी रोक दिया था। उनकी शहादत आज पूरी दुनिया में मनाया जाता है। कर्बला में हुई इस हक और बातिल की जंग में इमाम के कुनबे के बहत्तर लोग शहीद हुए थे। इमाम-ए-हुसैन नबी-ए-करीम के नवासे थे। इनका जन्म 8 जनवरी 626 ई० को मक्का के पवित्र स्थान ‘काबा शरीफ’ मेऔ हुआ था।

इमाम-ए-हुसैन किसी एक मजहब व सम्प्रदाय के नहीं थे। बल्कि वे संपूर्ण मानव जाति के थे। जुल्म, नाइंसाफी एवं असत्य के आगे सर न झुकाने वाले इमाम-ए-हुसैन 61 हिजरी 680 ई० ईराक स्थिति कर्बला के मैदान में लड़ते हुए शहीद हुए  थे। इमाम के उन मासूमों की याद में सात मुहर्रम को मेंहदी (छोटी ताजिया) रखी जाती है। कर्बला के मैदान में हुए दिल दहलाने वाले इस युद्ध में इमाम-ए-हुसैन ने अपने बहत्तर साथियों के साथ भूखा-प्यासा रहकर दसवीं मुहर्रम को यजीदियों ने शहीद कर दिया था। इमाम अपने छोटे लश्कर के बल पर सबसे शक्तिशाली क्रूर शासक यजीद व उसकी एक लाख फौज के छक्के छुड़ा दिया था। यजीद चाहता था कि कि इमाम उसे इस्लाम का खलीफा मान लें और उसके हाथ पर बैअ्त यानि (संधि) कर लें। लेकिन इमाम ने ऐसा न करने का प्रण कर लिया। 28 रज्जब सन् 61 हिजरी को इमाम अपने परिवार के साथ मदीने से चले, 5 माह सफर करने के बाद दो मुहर्रम को कर्बला के मैदान में पहुंच शिविर लगाया। इसकी सूचना यजीद को हुई। उसने पहले बैअ्त का प्रस्ताव भेजा। जिसको अस्वीकार करने पर सात मुहर्रम से ही पानी बंद कर दिया और नौ मुहर्रम की रात्रि में ही फौजों के साथ इमाम के काफिले पर हमला कर दिया। इस हमले का मोर्चा हजरत अब्बास ने रोका।

इमाम ने जालिमों से इबादत के लिए एक रात्रि का समय मांगा। दस मुहर्रम की सुबह यजीद के फौज की कहर से इमाम के एक-एक करके साथी शहीद हो रहे थे। 6 माह का मासूम अली असगर को हुरमला ने तीन फाल का तीर मारकर शहीद कर दिया, अली अकबर बेटे व भतीजा कासिम भाई हजरत अब्बास को नदी के किनारे काटकर शहीद कर दिया गया। आखिर में दोस्त मुस्लिम के शहादत के बाद शिविर में गये इमाम से महिलाओं ने अन्य लोगों के बारे में पूछा तो दुखी होकर उनके शहादत की बात बताई। उसके बाद इमाम घोड़े पर सवार होकर जंग-ए-मैदान की ओर चले तो इमाम की चार वर्षीय पोती सकीना उनसे लिपट गई। जिसको समझाकर बहन जैनब के हवाले कर आगे बढ़े। कर्बला के मैदान में इमाम की वीरता देख यजीद की फौज पीछे भागने लगी।

इमाम के वफादार घोड़े ने कइयो को अपनी टापों से रौंद डाला। यजीदी फौजों ने इमाम को लहुलुहान कर दिया। इमाम जब नमाज के सर को सजदे में रखा ही था कि जालिम पिसर नामक यजीदी ने गर्दन पे तलवार मारी जिससे सर धड़ से अलग हो गया। इंसानियत तार-तार होने से मानवता रो पड़ी, यजीद की फौज ने इमाम के शिविर में आग लगा दी। मौजूद औरतें व बच्चों को कैद कर लिया। कर्बला के तपते रेगिस्तान में शहीद हुए बहत्तर लोगों की लाशों को कई दिनों बाद दफनाया गया। इस तरह इमाम ने इंसानियत को बचाने के लिए सभी को कर्बला में कुर्बान करा दिया। परन्तु अत्याचार, असत्य के आगे झुके नहीं। उनकी यादगार में ताजिया रखने के लिए सात मुहर्रम को छोटी व नौंवी की रात में बड़ी ताजिया रखकर मनाया जाता है।

सातवीं पर मातम का माहौल फिजा में गूंजी या हुसैन की सदाएं

मुहर्रम की सातवीं तारीख को पूरा माहौल गमजदा हो उठा। फिजा में मातम के नारे और या हुसैन की सदाएं चारो ओर गूंजती रही। जिले भर में मुहर्रम की सातवीं के मौके पर कई स्थानों पर बड़ी संख्या में अकीदत मंद एकत्र हुए। बड़ी संख्या में विभिन्न स्थानों से अलम के जुलूस निकालकर अपने गंतव्य पर पहुंचकर दुरुद व फातिहा पढ़ा।

रिज्वी नगर बौगड़ा के दरगाह हजरत अब्बास पर भारी भीड़ सुबह से ही एकत्र होने लगी। दोपहर होते यह संख्या हजारों में पहुंच गई। सैकड़ों की संख्या में ढोल, ताशों के साथ अलम के जुलूस कई स्थानों पर पहुंचा और अकीदतमंदों ने दुरूद-फातिहा पढ़ा।

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