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छठी मुहर्रम:मानवता और इंसानियत’ से हारा जुल्म व जालिम

मुश्ताक अहमद

गोंडा। हजरत इमाम-ए-हुसैन नबी-ए-करीम के नवासे और मौला अली के पुत्र थे। हजरत इमाम-ए-हुसैन अपने ‘नाना’ के गोद में पले-बढ़े थे। जो बचपन से ही ‘नाना’ के वसूलों अपनी आंखों से मानवता और इंसानियत  फैलते और फूलते हुए देखा था।  इस महान कार्य के लिए जो बलिदान उनके ‘नाना’ नबी-ए-करीम ने किया था,उसको वह यजीद के हाथों नष्ट होते नहीं देख सकते थे। अंततः जब क्रूर शासक यजीद ने इमाम-ए-हुसैन से कहा कि तुम मुझे इस्लाम धर्म व सारे मुसलमानों का ‘खलीफा’ स्वीकार कर लो तो इमाम ने बिना देर किए स्पष्ट रुप से जालिम यजीद को उत्तराधिकारी मानने से मना कर दिया। इमाम जानते थे कि यजीद का चरित्र इस योग्य नहीं है कि उनको ‘खलीफा’ स्वीकार किया जा सके।

इमाम-ए-हुसैन 18 रज्जब 60 हिजरी यानि 10 जनवरी 680 ई० 56 वर्ष की उम्र अपना वतन मदीना को छोड़कर सपरिवार कर्बला की ओर रुख किया। मंजिलें तय करते हुए वह हज के इरादे से 60 हिजरी को मक्का पहुंचे, लेकिन इमाम-ए-हुसैन के पहुंचने से पहले ही वहां पर यजीद के सैनिक इमाम-ए-हुसैन को कत्ल करने के इरादे से हाजियों के भेष में ‘काबाशरीफ’ में दाखिल हो चुके थे। इसकी जानकारी इमाम-ए-हुसैन को हो चुकी थी।  वह नहीं चाहते थे कि ‘काबा’ की सरजमीं खून से रंगीन हो जाए। अतः उन्होंने अपनी यात्रा को उमरे में परिवर्तित कर कर्बला चले गये। लेकिन जालिम शासक यजीद और उनके साथियों ने इमाम-ए-हुसैन को कर्बला के मैदान में चारों ओर से घेरकर उन पर और उनके परिवार के साथ जुल्म-ज्यादती करना शुरु कर दिए।

मुहर्रम की सात तारीख से हक और इंसानियत को मिटाने के लिए यजीद ने इमाम और उनके परिवार तथा उनके साथियों पर पानी बंद कर दिया गया। यहां तक कि उनके 6 माह के मासूम बच्चे को शहीद कर दिया। इस प्रकार इमाम ने अपने परिवार और साथियो सहित आखिरी ‘हदीसा’ भी खुदा की राह में पेश कर दिया। तीन दिन भूखा-प्यासा रहकर ‘हक’ के लिए ऐसी जंग की कि हमजा जाफर की शान और हैदरे सफदर की याद दिला दी। इमाम अभी जुल्म से जंग में मशरुफ थे कि आवाज-ए-कुदरत (आकाशवाणी) आई कि बस करो, हुसैन तुम अपनी सब्र की मंजिल को पूरा कर चुके हो। यह आवाज कान में पड़ते ही इमाम ने अपनी तलवार रोक ली। इसके बाद यजीदी फौज ने इमाम को चारों ओर से घेरकर उन पर एक बारगी हमला कर दिया। इमाम बुरी तरह जख्मी होकर घोड़े से जमीन पर आए और शिम्र नाम के जालिम यजीदी व्यक्ति ने आपको शहीद कर दिया।  इमाम-ए-हुसैन और उनके परिवार एवं साथियों की लाशें मैदान-ए-कर्बला के गर्म जमीन पर कई दिनों तक बे कफन रहीं। इमाम-ए-हुसैन और उनके बहत्तर जानिंसार साथियो ने कर्बला के मैदान में अपनी कुर्बानी देकर मानवता और इंसानियत को जिंदा-ए-जावेद कर दिया।

नौ अगस्त को इन्हीं कर्बला के बहत्तर शहीदों के शहीदी का दिन है। इस दिन कर्बला के उन सभी शहीदों को याद किया जाता है, जिन्होंने यजीद  की बातिल ताकत को सदा के लिए पूरी दुनियां से खत्म कर दिया।

हम हिंदुओं ने तुझे कहा देवता हुसैन

इनके रोम-रोम में गंगा-जमुनी तहजीब रची-बसी है। हिंदू परिवार में जन्मे पर इमाम-ए-हुसैन को खिराज-ए-अकीदत सोज और सलाम पढ़कर अदा करते हैं। हम बात कर रहे हैं मनीष की। दस वर्ष की उम्र में संगीत साधना कर रहे मनीष हजरत इमाम-ए-हुसैन की शिक्षाओं से खास प्रभावित हैं। मुसलमान न होते हुए भी मनीष मुहर्रम के महीने में मजलिस और मातम के दौरान हजरत इमाम-ए-हुसैन की याद में सोज और सलाम पढ़ते हैं।

हनुमान भक्त मनीष को बचपन से ही संगीत का शौक था। इनके पिता पंडित राहुल ने पहचाना और उस्ताद अफजल अब्बास से संगीत की शिक्षा दिलाना शुरू किया। पंडित हरिशंकर मिश्र दिल्ली घराने के उस्ताद नसीर अहमद से संगीत की शिक्षा पाने वाले मनीष उर्दू और फारसी की सूफियाना गजलों को महारथ के साथ गुन-गुनाते हैं।

वह बताते हैं कि इमाम-ए-हुसैन के नाम पर सोज और सलाम पढ़ने की प्रेरणा उनकी अजीम शहादत को सुनकर व पढ़कर मिली। मनीष कहते हैं हजरत इमाम-ए-हुसैन ने यजीद से कहा कि मुझे भारत जाने दो। यह जुमला मुझे बेहद प्रभावित कर गया कि इतने महान इमाम भारत आना चाहते थे। यही हमारी गंगा-जमुनी तहजीब का बेजोड़ नमूना है। जिसे हमको आज के ‘यजीदियों’ से बचना है। मनीष आज के नौजवानों द्वारा पढ़े जा रहे सोज और सलाम व नौहे से खासे आहत हैं। वह कहते हैं कि यह बगैर रागदारी के पढ़े जा रहे हैं जिससे मर्सियों और सोज का दर्द खत्म हो रहा है। ख्याल, ठुमरी, दादरा और भजन को अपनी सुरीली आवाज में सजाकर पेश करने वाले मनीष का सोज सुन कभी शिया धर्म गुरु मरहूम मौलाना कल्बे सादिक भी रो दिए थे। कर्बला के शहीदों की दीवानगी के खातिर वह कहते हैं ‘दीवाने होते हैं बनाये नहीं जाते’।

उन्होंने बेगम अख्तर से भी बाकायदा गजल, सोज और सलाम सीखा है। मनीष के साथ ही लखनऊ के डा० मुकेश कुमार, अरविंद गुप्ता व डा० सारंग मोहली मजलिसों व मातम में बढ़चढकर हिस्सा लेते हैं। मनीष काफी अर्से तक यह कारी हैदर के भी शिष्य रहे जोकि लखनऊ में मर्सिया और नोहे के अच्छे उस्तादों में से एक हैं। अपनी भावनाएं मनीष कुछ यूं व्यक्त करते हैं ‘ हुसैन तेरे नाम पर फिदा हैं सारे भारतीय, कहीं है तेरे ताजिए कहीं हैं तेरी आरती, हम ब्राहमणों ने तुझे कहा देवता हुसैन, शहादतों की आबरु शहीदे कर्बला हुसैन’।

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