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मुहर्रम:इंसानियत को मिटाने चला यजीद का सब मिट गया,लेकिन दास्तान-ए-कर्बला आज भी ज़िंदा है

मुश्ताक अहमद

गोंडा।जुल्म और ज्यादती को मिटाने के लिए कर्बला में इमाम-ए-हुसैन के बहत्तर जांनिसार साथियों ने जो बेमिसाल काम किया,उसकीं मिसाल दुनिया मे नहीं मिलती। आलम-ए-इस्लाम ही नहीं पूरी दुनिया के लोगों को यह मानने पर मजबूर होना पड़ा कि हक और बातिल के बीच हुई जंग में कर्बला के शहीदों ने जो जीत हासिल की वह कयामत तक कायम रहेगी।

हजरत इमाम-ए-हुसैन मुल्क या हुकुमत के लिए जंग नहीं की,बल्कि वह इंसान के सोए हुए जेहन को जगाने आए थे। उनके काफिले मे शामिल बूढ़ें,जवान,बच्चे और महिलाओं ने खुद पर जुल्म सहन कर लिया, इंसानियत और ‘नाना’ के दीन को जालिम यजीद से बचा लिया।आशूरा के दिन कर्बला में जब इमाम-ए-हुसैन के सारे साथी और घर वाले शहीद हो गये और इमाम तन्हा हो गये तो उन्होंने आवाज दी  ‘ है कोई जो मेरी मदद को आए’ यह जुमला सुनकर शहीदों की लाशे जमीन-ए-कर्बला पर तड़पने लगीं और कटे हुए सरों से आवाजें आने लगीं कि मौला, मौत ने हमें विवश कर दिमा,वरना हम आपकी मदद को आते।

इमाम की यह आवाज खेमे के अंदर भी गई,इमाम के 6 माह का बेटा हजरत अली असगर ने अपने को झूले से गिरा लिया।मानो वह कहना चाहते है कि कि जुल्म को मिटाने का वक्त आ पड़ा है तो मैं 6 माह का सही लेकिन कुर्बानी देने को तैयार हूं। खेमें में रोने की आवाजें आने लगी। शोर सुनकर इमाम खेमे में गये तो यह मंजर देखा। बहन जैनब ने भाई को बताया कि इमाम की मदद की आवाज सुनकर हजरत अली असगर ने किस तरह अपने को झूले से गिरा लिया। इमाम ने बहन से कहा कि मेरे बच्चे को मुझे दो। इसे पानी पिला लाऊं। शायद जालिम इस पर तरस खाकर इसे पानी दे दें। गोद में लेके इमाम-ए-हुसैन ने हजरत अली असगर को चले। मां ने हसरत से बच्चे की तरफ निगाह डाली, जैसे कहना चाहती हों कि नन्हे सिपाही मेरे दूध की लाज रखना क्योंकि वह जानती थीं कि सुबह से जो मैदान में गया वह वापस नहीं आया है।

इमाम-ए-हुसैन ने बच्चे को तेज धूप से बचाने के लिए अपनी अबा का दामन बच्चे पर डाल दिया। एक बुलंदी पर खड़े होकर हजरत इमाम-ए-हुसैन ने हजरत अली असगर के ऊपर से अबा हटा दी। और उन्हें अपने हाथों से ऊपर उठाकर कहा कि यह बच्चा तीन दिन से भूखा-प्यासा है। यदि तुम्हारी नजरों में मैं कुसूर वार हूं। इस बच्चे का कोई दोष नहीं है। जहां तक सवाल इसे पानी पिलाने का है यदि तुम्हें यह खतरा है कि मैं इसके बहाने पानी पी लूंगा तो मैं बच्चे को तपती जमीन पर लिटा दे रहा हूं। तुम खुद इसे पानी पिला दो।

यजीदी लश्कर जो कि जुल्म-ज्यादती की हद को पार करने में माहिर थी। वह इमाम की बात का जवाब नहीं दिया। बच्चे को देखकर फौजियों में कानाफूसी शुरु हो गई। यजीदी फौजों का सिपहसालार पिसर ने देखा, तो वह दंग हो गया। सोंचा कि कहीं फौज बगावत न कर दे। उसने फौरन सबसे बेरहम तीरनदाज हुरमला को हुक्म दिया कि इमाम के लाडले को शहीद कर दो। अली असगर के शहीद होने से जमीं और आसमां भी कांप गये। तीर से हजरत अली असगर का गला छिदा और इमाम का बाजू जख्मी हुआ। हजरत अली असगर इमाम के हाथों पर शहीद हो गए।

‘यह कर्बला की शहादत भी क्या शहादत है,

अब इसके बाद अगर है तो फिर कयामत है।

हजार साल हुए एक सानेहा गुजरा,

कि जिसमें आज भी इक ताजगी है, नुदरत है’।

गम-ए-हुसैन में अश्कों से नहाए अजादार

रिज्वी नगर बौगड़ा गांव में मंगलवार का दिन मजलिसों और मातम के नाम रहा। मजलिस में मौलाना सैयद अब्बास मुजफ्फरपुर विहार  व मौलाना शबाब हैदर जलालपुरी  की तकरीर का असर दिखा।

कर्बला मे यजीदी फौजों द्वारा इमाम पर ढाए गये जुल्म-ज्यादती सुनने मौजूद अजादारों की पलकें गमजदा हो गई। मौलाना  सैयद अब्बास व मौलाना सैयद शबाब हैदर  ने इस्लाम के लिए हुसैन की चंद तारीफ से तकरीर पढ़ी और कहा कि इंसान को बेदार हो लेने दो, हर कौम पुकारेगी हमारे हैं हुसैन। जनाब अब्बास व शबाब  हैदर ने इस्लाम, शहादत और कर्बला के बाबत विस्तार से बयान किया कि जिस तरह से जुल्म के खिलाफ इमाम-ए-हुसैन ने कर्बला में शहादत दी, मौला की शहादत ने इंसानियत को शर्मसार होने से बचा लिया। कर्बला का वाकया इस्लाम की तारीख में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में एक बेहतरीन मिसाल है। उसी तरह उनकी यादगारी में इंसानियत को बचाने के लिए सब कुछ छोड़कर अपने को अता करना ही उनकी सच्ची यादगारी है।

यहां तो अनोखी सी है सदभाव की अटूट मिसाल

वे हिंदू हैं लेकिन मुहर्रम में ताजिया रखकर गमजदा होते हैं। इमाम-ए-हुसैन की शहादत को याद करते हुए मजलिस और मातम कर नजरान-ए-अकीदत पेश करते हैं। अवध के इस क्षेत्र में तमाम हिंदू साम्प्रदायिक सदभाव की भी मिसाल पेश कर रहे हैं। हम बात कर रहे हैं रिज्वी नगर बौगड़ा की कोंडर झील के पास बने हजरत अब्बास की दरगाह की। करीब 132 वर्ष पुराने इस दरगाह में हिंदुओं द्वारा अजादारी का सिलसिला आज भी बादस्तूर जारी है। यहां आठवीं मुहर्रम को मन्नती ताजिया रखा जाता है। और दरगाह शरीफ को फूलों से सजाया जाता है। दरगाह में चांदी का दुल्जना और अलम भी रखे जाते हैं। ताजिया दसवीं मुहर्रम को कर्बला (बारादरी) में सुपुर्द-ए-खाक किया जाता है। खास बात यह है कि दरगाह की देखरेख हिंदू मनीराम करते हैं। बकौल मनीराम हमारे पूर्वज संतराम को कोई औलाद नहीं थी, दरगाह पर उन्होंने मन्नत मांगी, कि यदि बच्चा जन्म लिया तो वे हजरत अब्बास की दरगाह बनाएगें। वर्ष 1880 में पुत्र के जन्म लेने के बाद दरगाह बनवाया गया जो आज हजरत अब्बास के दरगाह के नाम से प्रसिद्ध है। इसी तरह सहिबापुर में भी पजतन नाम से पुश्तैनी इमामबाड़ा बना हुआ है। इमामबाड़े की देखरेख की जिम्मेदारी संभाल रहे महेश विश्वकर्मा ने बताया कि उनके दादा रामनिहाल ताजिया रखते थे। उनके द्वारा बनवाए गये ताजिया आसपास के इलाके में चर्चा का विषय होता था। इमाम-ए-हुसैन की शहादत को याद करते हुए दादा रामनिहाल मजलिस व मातम कर मौला को नजरान-ए-अकीदत पेश करते थे। आज भी उनकी तीसरी पीढ़ी ने इसे जारी कर रखा है। कलकत्ता में रहने वाले रामसुमेर का पूरा परिवार मुहर्रम के दौरान गम मनाया जाता है। वहीं तुलसीपुर के गड्डन मुनीजर, करदा के सत्य नरायण शास्त्री पूरे मुहर्रम गमजदा होकर मजलिस और मातम में शरीक होते हैं।

लेखक :मुश्ताक अहमद चीफ एडीटर यूपी लाइव न्यूज

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