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हजरत इमाम-ए-हुसैन और उनके 72 जानिसार साथियों की शहादत की याद है मुहर्रम,अजाखानों में रखे जाते हैं ताजिए

मुश्ताक अहमद

हक और बातिल की सख्त पहचान है जंग-ए-कर्बला

 

गोंडा। जंग-ए-कर्बला में हजरत इमाम-ए-हुसैन और उनके जानिसार 72 साथियों की शहादत के गम में मनाए जाने वाले मुहर्रम को लेकर इमामबाड़ों में ताजिया रखने के लिए शिया  समुदाय के लोगों द्वारा तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। मजलिसों और मातम के लिए फर्श-ए-अजा को सजाने में जुटे हैं।

क्या है मुहर्रम क्यों मनाया जाता है

इंसानियत और इस्लाम को बचाने के लिए नबी-ए-करीम के नवासे हजरत इमाम-ए-हुसैन ने अपने कुनबे के लोगों और 72 साथियों की कुर्बानी कर्बला के मैदान में दी थी। तब से इस्लाम अनुयायियों के लिए मुहर्रम की अहमियत सबसे अलग है।

हजरत इमाम-ए-हुसैन का काफिला 61 हिजरी (680 ई०) कर्बला के तपते हुए रेगिस्तान में पहुंचा। इस काफिले के हर शख्स को पता था कि इस रेगिस्तान में भी उन्हें चैन (सुकून) नहीं मिलने वाला और आने वाले दिनों में उन्हें और अधिक परेशानियां वरदाश्त करना होगा। बावजूद इसके सबके इरादे मजबूत थे। अमन और इंसानियत के ‘मसीहा’ का यह काफिला जिस वक्त धीरे-धीरे कर्बला के लिए बढ़ रहा था, रास्ते में पड़ने वाले हर शहर और कूचे में जुल्म और प्यार के फर्क को दुनिया को बताते चल रहा था।

बेहद जालिम बादशाह था यजीद

उस दौर में यजीद जो एक जालिम हुक्मराह था। वह बजाहिर मुसलमान लेकिन हकीकत में इस्लामी पसंदी का तालीमात का मुखालिफ था। वह अपने जुल्म और ज्यादती के बदौलत शाम(सीरिया) का हाकिम बन बैठा था। वह इमाम-ए-हुसैन को अपना दुश्मन समझता था और इस्लाम को अपनी हुकूमत के लिए सबसे बड़ा खतरा समझ रहा था।

किरदार-ए-वफा थे हुसैन

हजरत इमाम-ए-हुसैन अपने इल्म, एखलाक और किरदार की वजह से अपने वालिद हजरत मौला अली और नाना नबी-ए-करीम की तरह मकबूल थे। इस बीच यजीद की साजिशें बढ़ीं जिसमें इमाम-ए-हुसैन का मदीने में रहना दुश्वार हो गया। आपने समझ लिया कि यदि मदीने में रहा तो यहां मजहब के नाम पर खुरेंजी होगी। इसलिए उन्होंने मदीना छोड़ने का फैसला किया। इमाम से लोगों के प्यार की सबसे बड़ी वजह यह थी कि वो इस्लाम के आखिरी पैगम्बर के नवासे थे और मिटती हुई इंसानियत को बचाने के लिए जुल्म के खिलाफ निकले थे।

मुहर्रम का चांद देखते ही कलेजा थर्रा जाता है

आज भी मुहर्रम के चांद पर नजर पड़ते ही इंसानियत का कलेजा कांप उठता है। इसकी वजह यह है कि इस चांद की दस तारीख को पैगम्बर-ए-इस्लाम की इकलौती बेटी हजरत-ए- वीबी फात्मा के आंखों के तारे इमाम-ए-हुसैन को दहशतगर्दों ने बेरहमी के साथ तीन दिन के भूखे-प्यासे को कर्बला की तपती हुई रेगिस्तान में शहीद कर दिया था। दहशतगर्दों ने इमाम को यह सोंचकर शहीद किया था कि इंसानियत को दुनिया से मिटा दूंगा, लेकिन वह भूल गया कि वह जिसका खून बहा रहे हैं वह नवासे रसूल का हैं। जो इस अजम के साथ घर से बाहर आया है, वह हक और बातिल के फर्क को दुनिया से मिटा देंगें।

लखनऊ का बड़ा इमामबाड़ा 👆

जब हुसैन ने छोड़ा मदीना

इमाम-ए-हुसैन ने अपने नाना का रौजा मां की कब्र भाई हजरत-ए-हसन की कब्र का आखिरी बार जियारत कर मदीना छोड़ दिया था। इमाम मदीने से चले तो पूरा खानदान आपके साथ था, सिर्फ एक बीमार बेटी हजरत-ए- जैनब-ए-सुगरा को नबी-ए-करीम की जौजा हजरत-ए-उम्मे सलमा के पास छोड़ दिया था। 28 रज्जब को मदीने से रवाना हुआ यह काफिला रास्ते की मुसीबतें बर्दाश्त करता हुआ कर्बला पहुंचा। रवायतों में है कि एक जगह पह़ुचकर इमाम के घोड़े ने कदम आगे नहीं बढ़ाया यहां तक कि इमाम ने सात घोड़े बदले लेकिन सभी घोड़ो ने एक भी कदम आगे नही बढ़ाया। तो इमाम ने अपने भाई हजरत-ए-अब्बास से कहा कि यहां कयाम (ठहरा) किया जाये और खेमे लगवा दिए जाएं।  फिर मकामी लोगों व इस जमीन के मालिकों को बुलाकर 60 हजार दीनार में यह जमीन खरीदी और इमाम-ए-हुसैन ने कहा कि इस जगह को हम लोग आबाद करेंगे और आज से यह मुकाम कर्बला के नाम से मशहूर होगा।

बेजोड़ है बौगड़ा और सहिबापुर का मुहर्रम

बौगड़ा और सहिबापुर का मुहर्रम बेजोड़ है। यहां दूर-दूर से लोग ताजियादारों का खिराज-ए-अकीदत देखकर हैरत में पड़ जाते हैं। लगातार दो माह आठ दिन तक इमाम-ए-हुसैन की शहादत का असर सिसकियां और अश्कों में सैलाब बनता है।

गोंडा जिले के वजीरगंज ब्लाक के इन दो गांवों का मुहर्रम वाकई शिद्दत से होता है। जिसमें मुहर्रम पूरे अजादारी से एक माह आठ दिन(चेहल्लुम) मनाया जाता है। यूं तो मुहर्रम अन्य जगहों पर प्रायः दस दिन का ही होता है। लेकिन यहां खाना, शरबत, पानी और मजलिस के साथ मौला हुसैन की याद में मातम दस दिन विशेष रुप से किया जाता है। मुहर्रम के दौरान अपने रोजमर्रा के काम से विरक्त रहकर मातम में हिस्सा लेते हैं।

विदेश से आते हैं ताजिएदार

इन दो गांवों में खास तरह से मुहर्रम मनाने वाले लोगों के परिजन मातम के वक्त इकट्ठा जरुर होते हैं। यहां तक कि विदेशों में रह रहे लोग मुहर्रम के वक्त अपने घरों में जरुर दाखिल होते हैं।


स्वनिर्मित ताजिए से मनाते हैं मुहर्रम

यहां के अधिकांश ताजिएदार मुहर्रम में अपने द्वारा बनाए गये ताजिया ही चौक पर रखते हैं। जबकि यह कोई उनका व्यवसाय नहीं है। अपने हाथों से ही की गई कारीगरी पर ही विश्वास रखते हैं।

 

लेखक:मुश्ताक़ अहमद 

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